सोमवार, 30 जून 2014

जरूरी तो नहीं......

इस दस्तक पर, मेहमां भी हो सकता है
हर बार ही हवा हो, जरूरी तो नहीं
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कसूर हालात का भी, हो सकता है
हर शख्स बेवफा हो, जरूरी तो नहीं
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मेरे हमदर्दो में ही, बैठा है कातिल
हर लब पे दुआ हो, जरूरी तो नहीं
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लाश पे जख्म-ए-मोहब्बत, है साहब
मेरा क़त्ल ही हुआ हो, जरूरी तो नहीं
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उसका एक एक सितम, लाइलाज निकला
हर जख्म की दवा हो, जरूरी तो नहीं
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माँ की आँखे भी पढ़ कर, देखिये जनाब
मस्जिद में ही ख़ुदा हो, जरूरी तो नहीं.....  


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:-  www.prabhatparwana.com

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