मंगलवार, 18 मार्च 2014

आखिर चाहता क्या है?


यूँ ज़रा ज़रा करके, सताता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

तू खुदा मै नाखुदा, मान तो लिया मैंने
बाराह रुक रुक कर, जताता क्या है ?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ग़मो की आंच पर, सुलगती है खुशियाँ
दुनिया की हांडी में, पकाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?

ज़िंदगी का बोझ अब, ढोया नहीं जाता
मेरी रोक दे साँसे, तेरा जाता क्या है?
ऐ खुदा तू आखिर, चाहता क्या है?


        कवि प्रभात "परवाना"
 वेबसाईट का पता:- www.prabhatparwana.com

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