सोमवार, 30 अप्रैल 2012

लड़की पटाओ अभियान-व्यंग


दोस्तों मैं जानता हूँ समय की विवशताए होती है आजकल...
पर जब रिश्ते निभाने हो तो समय नहीं देखा जाता,
आपका और मेरा रिश्ता अब एक नए मुकाम को छूने जा रहा है,
हर घंटे मेरी नज़र अपने ब्लॉग पर होती है, चाहे मैं देश के किसी भी कोने में हूँ,
कौन नया सदस्य आया, किसने क्या प्रतिक्रिया दी, सब पर नज़र रखता हूँ
करीब एक लाख  बार मेरा ब्लॉग लोगो द्वारा विसिट किया जाना वाला ब्लॉग 
बनने को अग्रसर है.......
अगर मैं किसी विडिओ को शेयर करता हूँ तो उसमे कुछ ख़ास ही होता होगा ना, 
(फिर भी आप लोग नही देखते, कौन जहमत उठाये इतना समय किसके पास है सोच कर)
दोस्तों ये एक दम ताज़ा ताज़ा माल आपको सौपता हूँ, जिस जिस मित्र को अच्छी लगे 
मुझे मेल करके जरूर बताना(इन्तजार रहेगा)... prabhatkumar.bhardwaj@gmail.com 

------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"  
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/



शनिवार, 28 अप्रैल 2012

नूर-ए-खुदा ...


एक तिनका भी आँख में अटक जाए ना कही.....
 मंजिल तक पहुँचते पहुँचते भटक जाए ना कही........

खुदा, इश्वर, अल्लाह का जग में नाम ना होता,
तो जिस्म से रूह का सफ़र यु, आसां ना होता.....

जिन्दा जिस्म में मरी मरी, धड़कन धडकती बस,
 ना कही कोई दिवाली, और कही कोई रमजान ना होता...

मेरे गीत ग़ज़ल नगमे, सब सूने ही रह जाते,
गर मौजूद आपसा यहाँ, आवाम ना होता.....

---------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना" 

वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/ 



रविवार, 15 अप्रैल 2012

जिन्दा है जिस्म, रूह से मर गया हूँ मैं...

जिस प्रकार व्यापार का बहीखाता साल के अंत में व्यवस्थित होता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्मो का आंकलन समय समय पर करता है, और अगर सच्चे मन से मनुष्य खुद का आंकलन करे तो वो वह पाएगा की वास्तविक रूप से वो बहुत गिर चुका है..... अगली बार आप सोने से पहले इस कविता को मन ही मन गुथना...आप पाओगे की शायद, मेरी ये कविता सच्चाई से होकर गुजरती है, आपकी प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा.........


अपने बुने जाल में फस गया हूँ मैं,
सुलझने की चाह में, और उलझ गया हूँ मैं,
ला आज इस महफ़िल में, ये सच बोल दू,
नकाब बदलते बदलते, बदलते थक गया हूँ मैं.............

धोखा फरेब ही नहीं, दरिंदगी भी लांघ ली,
ना जाने किस किस हद्द से गुजर गया हूँ मैं.......

वो भूखे पेट नींव की, ईट ढोता रहा
और कंगूरे सा अकड़ कर, संवर गया हूँ मैं ...........

ना दया, ना धर्म और ना पाप की फिकर है,
जिन्दा है जिस्म, रूह से मर गया हूँ मैं......... 

-----------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"  
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/ 


               

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

गौ रक्षा के प्रोग्राम में......


भाई राजीव दीक्षित जिन्होंने विदेशी कंपनियों का भांडा फोड़ दिया.. और हमें बताया की कैसे हम उन्नति से अवनति की तरफ आ गए, उनको कुछ विदेशी ताकतों ने साजिश के तहत मरवा दिया, अब हमें उनकी जलाई चिंगारी को आग बनाना है, उनके आदर्शो पर चलना है,

अभी पीछे एक गौ रक्षा के प्रोग्राम में मुझे बुलाया गया, पता नहीं मैं कैसे और क्या क्या कह गया, ऐसा लगा मानो राजीव जी की आत्मा मुझमे प्रवेश कर गयी है और वही सब कुछ बुलवा रही है जब प्रोग्राम ख़त्म हुआ तो किसी ने मुझसे कहा की आपने जो बोला मैंने उसकी
वीडियो बनायी है, जब मैंने वो वीडियो देखी तो खुद मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैं तो वहाँ एक कविता पढ़ने गया था बस... और वहाँ क्या क्या कह गया.......

आजतक अगर आप लोगो ने यू ट्यूब पर मेरी कोई वीडियो नहीं देखी तो आज ये
वीडियो देखिये, मैं खुद हैरान हूँ, की ये हुआ क्या? आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी और आप शेयर भी करेंगे(वीडियो क्वालिटी लो है लेकिन आवाज साफ़ सुनाई देगी) 

------------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना" 
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/  



मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

मिट्टी से घरोंदे बनता रहा .......


जख्म पर जख्म खाता रहा,
मैं रोया नहीं, मुस्कुराता रहा,
मेरे वजूद पर ना उठा उंगलियाँ, 
मैं जलकर भी महफ़िल सजाता रहा.....

अजीब रस्म है, दुश्मनों से दोस्ती,
स्वागत में पलके बिछाता रहा......

ना आये अब कोई और तेरे आगोश में,
परवाना बुझकर भी, शम्मा जलाता रहा...

दरियादिली का मेरी,अंजाम ये हुआ,
मैं कमाता रहा, वो लुटाता रहा .......

उजड़े मेरा गुलशन, कोई फ़िक्र नहीं
मैं तो मिट्टी से, घरोंदे बनाता रहा......


-------------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"

वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/



गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

मेरी नफरत का समंदर भी देख


प्यार की नदियाँ देखी तूने,
मेरी नफरत का समंदर भी देख
चल अल्फाज़ से एक कदम आगे,
जलते परवाने का मंजर भी देख

पर्दा हट गया औकात से, जब चला गया सावन
तनहा तरस रहा हूँ मैं , मुझे बंजर भी देख

जर्जर हो गया हूँ मैं, पर तेरी शमशीर से नहीं,
सीने में दफ्न है सदियो से,वो खंजर भी देख

-------------------------कवि प्रभात कुमार भारद्वाज"परवाना"
वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/ 








सोमवार, 2 अप्रैल 2012

व्यापार बन गया है, अजनबी को लूटना


रौब अब खुदा पर, जमाने लगे है लोग,
लूट कर ही खुदा को, खाने लगे है लोग,
तहजीब नहीं खुद को, निगाह से निगाह मिलाने की,
ऐसे नहीं, ऐसे लो फैसले, हमें बताने लगे है लोग..........

ना जाम, ना साखी, ना पैमाना, ना दर्द है फिजा में,
बस सूखी सूखी महफिले सजाने लगे है लोग.........

  व्यापार बन गया है, अजनबी को लूटना
किस कदर गिर गिर कर, कमाने लगे है लोग..........

चिराग-ए-इश्क को मैं, मयस्सर क्यों करू?
हवा में मेरी बात को, उड़ाने लगे है लोग.........

अब खाम से  सवाल है, सबूत-ए-वजूद पर
क्यों खुदा को इस कदर, आजमाने लगे है लोग.......



---------------------------------कवि प्रभात "परवाना"

वेबसाईट का पता:- http://prabhatkumarbhardwaj.webs.com/